“ये मेरा … !
मैंने द्वारे साँकल…..
डेहरी फूल चढ़ा……”
दो दिन से ये लाईने दिमाग़ पर हावी थीं।
किर्र-किर्र, जेब में रखा फ़ोन वाइब्रेट कर रहा था।
इतनी सुबह सुबह कौन कॉल कर रहा होगा?
मोबाईल स्क्रीन पर तन्नू की फोटो देख कर चौंक गया।
“नमस्ते, इतनी सुबह? सब ठीक?”
“मन्दा, डैडी की याद आ रही है क्या ?”
“नहीं तो। हाँ, शायद। पर तुम्हें कैसे लगा?”
तन्नू से मेरी बात एक महीने पहले ही हुई थी।
“अरे, रात को दो बजे फ़ेसबुक पर डैडी की मनपसंद कविता पोस्ट कर रहे हो तो कुछ तो बात होगी। चालीस साल से तो हमने ये लाइने सुनी नहीं थीं।”
चालीस साल! नहीं शायद और समय हो गया होगा। यकायक ही वो शाम आँखों के सामने आ गई।
डैडी , डॉक्टर राजकुमार, व्हिस्की के ग्लास और एक टेप रेकॉर्डर ।
“ये मेरा पागलपन देखो,
मैंने द्वारे सांकल देखी ,
डेहरी फूल चढ़ा आया। “
“मन्दा, वो टेप हैं अभी?, फिर से सुनते , कितना मज़ा आता। शायद डाक्टर राजकुमार ने लिखा था और डैडी ने मस्ती में गा कर रिकार्ड किया था। फिर बाद में कितनी बार रिवाइन्ड कर कर के सबको सुनाते थे।”
चरखी वाले टेप रेकॉर्डर, 78 आर पी एम के काले रेकार्ड, जिनमे एक रेकार्ड में दो गाने होते थे, और रेकार्ड चेंजर जिसमे एक साथ आठ रेकार्ड लग जाते थे , याशिका का कैमरा, 8 एम एम का प्रोजेक्टर। डैडी के पास न जाने क्या क्या सामान थे । कितने शौकीन थे , कितने जिंदादिल। फ़ोटो खींचते और घर में ही डिवेलप करते, पहले नेगटिव फिर पाज़िटिव। एक कमरे को डार्क रूम बना रखा था।
“नहीं यार, रेकॉर्डर खराब हो गया था, बना नहीं तो कबाड़ी को दे दिया”
“और टेप्स ? और वो सारी फ़ोटो, शादी के बाद से कभी नहीं देखा”
कितनी सारी फ़ोटोज़, कितने सारे टेप्स, रेकॉर्ड्स, कितने सामान, डैडी की रोलेक्स घड़ी, म्यूज़िकल सिगरेट लाइटर, और न जाने क्या क्या। हर चीज़ के साथ कितनी यादें । पर तन्नू पिंकी की शादी के बाद किसी को इन सामानों में कोई रुचि नहीं रही। ईमोशनल अटैचमेंट ? हम भाई बहनों के सिवा इन पुरानी चीजों से किसी को अटैचमेंट क्यों होगा। सब बक्से में बंद कर दी गईं।
और फिर नए घर में शिफ्ट हो गए , सारी यादें पीछे छोड़ कर।
“बहन, वो सब गोमती में विसर्जित कर दिया”
“ठीक किया, मन्दा ! डैडी ने एक और शेर रिकार्ड किया था”
“हाँ यार याद है ,
“याद-ए-माज़ी ‘अज़ाब है या-रब
छीन ले मुझ से हाफ़िज़ा मेरा।”

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