“डॉकसाब देखिए हमारे बच्चे को क्या हो गया है, ठीक से साँस नहीं ले पा रहा है। कुछ करिए डॉकसाब।
जल्दी।”
घबराए से एक बुजुर्ग एक माह का बच्चा गोद में लिए दूसरे मरीजों को धकियाते हुए अंदर घुस आए।
उनके पीछे पीछे एक सहमी हुई सी महिला भी थी, ज़री की साड़ी, हाथों में चूड़ियाँ, माँग में सुर्ख़ लाल सिंदूर।
शायद बच्चे की माँ थी । बच्चा खाँस रहा था और साँस लेने में आवाज़ें निकाल रहा था। मैंने तुरंत उसे
अपनी मेज़ पर लिटाया और आला लगा कर चेक करने लगा। बच्चा सीरियस नहीं था। सिर्फ़ नाक में झाग
जैसा फंसा था । मैंने तुरंत सक्शन से नाक साफ़ किया और बच्चे को उसकी माँ को पकड़ा दिया।
“साबुन चला गया था नाक में। नहला रही थी क्या?” मैंने पूछा।
“जी” उसने दबी आवाज़ में कहा।
“आगे से ध्यान रखना नहलाते समय। बच्चे की दादी नहीं है घर पर? उनसे कहो ना, वो मदद किया करें
मालिश-नहलाने में”
“नहीं, वो साथ नहीं हैं, हम अकेले ही रहते हैं” दादा जी बीच में बोले।
“ओह, तो फिर कोई दाई रख लीजिए। इतनी कम उम्र में अकेले बच्चा संभालना मुश्किल होता है” मैंने माँ
की ओर इशारा करते हुए कहा ।
“और इससे कहिये थोड़ा सावधानी बरतें, बच्चा एकदम ठीक है, कोई दवा देने की ज़रूरत नहीं है, घर ले जा
सकते हैं । वैसे नाम क्या है बेबी का ?”
“कबीर” बुजुर्ग जो शायद बच्चे के दादाजी थे, हाथ में फ़ीस थमाते हुए बोले।
उस दिन के बाद से दादाजी कबीर को लेकर अक्सर ही आने लगे। साथ में हर बार कबीर की माँ। वैसे ही
पूरे मेकअप में।
“देखिए हमारे बाबू को बुखार है”
“डॉकसाब, हमारे बच्चे का पेट ख़राब है”
“हमारा बच्चा बोलना कब शुरू करेगा?”
“हम लोग इसे ऊपर का दूध कब से दे सकते है?”
दादाजी हमेशा कबीर को सीने से लगाये रखते। क्या पिलाना है, कैसे नहलाना है, टीके कब कब लगेंगे
बच्चा पालने के ऐसे कितने सवाल उनके पास होते। कबीर को मेरे पास आते शायद चार पाँच महीने हो
गए थे पर मैंने आज तक उसके पिता को नहीं देखा। दादाजी के साथ हमेशा उसकी माँ ही आती थी। पर
मुझे इससे क्या। हो सकता है किसी दूसरे शहर में काम करता होगा। जब छुट्टी मिलेगी तो आयेगा।
एक दिन अखबार पढ़ रहा था कि अचानक एक जानी पहचानी शक्ल पर नज़र पड़ी। कबीर के दादा जी
की तस्वीर शोक संवेदना वाले कॉलम में छपी थी। -“सीआरडीआई के रिटायर्ड साइंटिस्ट प्रोफेसर सक्सेना
की अड़सठ वर्ष की आयु में हार्ट अटैक से मृत्यु”। शोक संतप्त परिवार की सूची में एक पत्नी, दो पुत्र-
पुत्रवधू , एक बेटी और कुछ नाती पोतों के नाम दिए थे। कबीर को गोद में लिए हुए उनकी छवि मेरी
आँखों के आगे कौंध गई। थोड़ा दुख हुआ ये खबर पढ़ कर। कितना ख्याल रखते थे अपने पोते का।
उस दिन मैं क्लिनिक बंद ही कर रहा था कि कबीर को गोद में लिए उसकी माँ अंदर आई। अकेली।
“डॉकसाब कबीर को सुबह से बहुत तेज बुखार है। डोलो दिया था और ठंडी पट्टी भी रखी पर कम नहीं
पड़ रहा”
“परेशान मत होइए, इधर बैठिए, अभी देखते हैं”
वो कबीर को गोद में लिए हुए स्टूल पर बैठ गई तब मेरा ध्यान उसपर गया। सफेद साड़ी । कोई
मेकअप नहीं। एक हाथ में एक सोने की चूड़ी। चेहरे से जैसे रौनक गायब थी।
“प्रोफेसर साहब का सुन कर बहुत अफसोस हुआ” मैंने कबीर का बुखार चेक करते हुए कहा, “उस दिन
अखबार में देखा। मैं नहीं जनता था वो साइंटिस्ट थे”
बुखार 103 के ऊपर था।
“आपके पति नहीं आए साथ में। कबीर को इतना बुखार है उन्हे आना चाहिए था”
“प्रोफेसर साहब मेरे पति थे”
मैं चौंक गया। “ पर वो अखबार में तो उनकी पत्नी और बच्चों के बारे में ….”
“वो उनकी पहली पत्नी हैं, हमारी लव मैरिज हुई थी । वो मेरे थीसिस गाइड थे। शादी के बाद सबने उनसे
संबंध तोड़ दिया था तो वो मेरे ही साथ रहते थे”
“दवा दीजिए, दो दिन बाद फिर दिखा दीजिएगा । वायरल फीवर है ठीक हो जाएगा” मैंने पर्चा पकड़ते हुए
बोला।

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